मेरा नाम किशोर राम है। मैं भारत के एक ग्रामीण क्षेत्र राजस्थान के एक गाँव में पैदा हुआ और बड़ा हुआ। हीमोफिलिया ए से पिड़ित छोटी-सी चोट से भी बिना रुके खून बहने लगता है। लेकिन बचपन में मुझे इसकी सही पहचान भी नहीं थी।गाँव के सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों ने कभी नाम तक नहीं सुना था हीमोफिलिया का। महीनों तक दर्द और सूजन के साथ मैं बिस्तर पर पड़ा रहता। कई बार तो स्कूल जाना छोड़कर लगातार तीन-चार महीने अस्पताल की चारपाई पर गुजारने पड़े थे। माँ-बाप दिन-रात मेरे सिरहाने बैठे रहते थे। पिता जी खेतों में मजदूरी छोड़कर मेरे पास आ जाते और माँ रात-रात भर मेरे सुजन के जोड़ों पर ठंडी पट्टी रखतीं। उनके धैर्य और प्यार के बिना शायद मैं आज यह कहानी भी नहीं सुना पाता।समय के साथ धीरे-धीरे पता चला कि यह हीमोफिलिया ए है। लेकिन इलाज कहाँ? गाँव में न तो फैक्टर इंजेक्शन उपलब्ध था, न ही कोई विशेषज्ञ। हर बार मुझे 75 किलोमीटर दुर जोधपुर के बड़े अस्पताल ले जाना पड़ता था।फिर घंटों लाइन में खड़े रहना – कभी फैक्टर की कमी, कभी डॉक्टर की छुट्टी, कभी बेड न मिलना। इलाज में देरी हो जाती और खून अंदर ही अंदर जोड़ों में भर जाता। धीरे-धीरे घुटनों, कोहनियों में स्थायी क्षति होने लगी। बाहर से देखने में मैं स्वस्थ और सामान्य लगता हूँ, लेकिन अंदर ही अंदर जोड़ों का दर्द मुझे हर पल याद दिलाता है कि मैं हीमोफिलिया के साथ जी रहा हूँ। पिछले दो-तीन सालों में स्थिति और बिगड़ गई। समय पर फैक्टर नहीं मिल पाने के कारण जोड़ों में गंभीर सूजन और दर्द शुरू हो गया। अब चलना-फिरना भी मुश्किल हो रहा है। काम-धंधा, परिवार की जिम्मेदारी, यहाँ तक कि छोटी-छोटी खुशियाँ भी प्रभावित होने लगी हैं। कभी-कभी दर्द इतना तेज होता है कि आँखों में आँसू आ जाते हैं, लेकिन माँ-बाप के चेहरे याद आते हैं और मैं फिर से कोशिश करता हूँ। अब हीमोफिलिया सोसायटी के साथ जुड़कर कार्य कर रहा हूं कोई और बच्चा मेरी तरह लंबे समय तक अस्पताल की चारपाई पर न पड़ा रहे।हीमोफिलिया ने मुझे कई चीजें छीनीं बचपन की दौड़-भाग , दोस्तों के साथ बेफिक्र खेलना। लेकिन इसने मुझे कुछ अनमोल भी दिया धैर्य, संघर्ष की ताकत और उन माता-पिता का अटूट विश्वास जिन्होंने कभी हार नहीं मानी। शायद जल्द ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी सही इलाज पहुँच जाए। मेरी यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं, हजारों हीमोफीलिया वाले बच्चों की है जो गाँवों में चुपचाप दर्द सह रहे हैं।